Sunday, January 3, 2010

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी
अराति सैन्य सिंधु में, सुबाड़वाग्नि से जलो
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो बढ़े चलो

------- जयशंकर प्रसाद

Tuesday, December 29, 2009

जीवन संघर्ष --- संघर्ष जीवन

आँख खुली है जबसे
हुआ शुरू जीवन संघर्ष

रो-रोकर चिल्लाकर
भूख मिटाने का संघर्ष

गिडते-पड़ते नाक तोड़कर
चलना सीखे कर संघर्ष

आधी नींद मे सवेरे उठकर
पढ़ने जाने में संघर्ष

ज्ञानार्जन की किसे फ़िक्र थी
अव्वल आने का संघर्ष

खेल-कूद मे भी होता था
जीत कर आने का संघर्ष

बड़े हुए तो पता लगा की
अभी तो शुरू हुआ नही संघर्ष

क्या इच्छा है क्या है आशा
पता लगाना भी संघर्ष

स्वयं की आकांक्षाओं, अन्य की अपेक्षाओं
पे खरा उतरने का संघर्ष

अर्थार्जन कर अपने पैरो पे
खड़े होने में है संघर्ष

कौन हितैषी कौन विद्वेषी
पता लगाना है संघर्ष

'क्या-क्यों-कैसे-' के तूफ़ानों से
लड़ते रहे करते संघर्ष

अपने लिए तो सब जीतें हैं
औरों के लिए जीना है संघर्ष

कौन है तू, और क्यो आया है
चहुँओर घुमाती जिज्ञासा कराती संघर्ष

सच है यह कोई दोमत नहीं
पग-पग पर करना है संघर्ष

पर है एक तथ्य यह भी सही
संघर्ष-रहित जीवन, जीवन नहीं

जल का महत्व समझा है वही
तपती धूप मे भटका जो कहीं

सोने मे चमक कभी आती नही
अगर अग्नि उसे जलाती नहीं

मानव रह जाता आदिमानव ही
यदि सतत-संघर्ष करता नहीं

अंततः सिर्फ़ कहना है यही
कि संघर्ष-रहित जीवन, जीवन नहीं

Wednesday, December 23, 2009

सरफरोशी की तमन्ना

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

-----------राम प्रसाद बिस्मिल

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ

चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ

चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ

मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक ।।

- माखनलाल चतुर्वेदी

Friday, November 20, 2009

A thousand desires such as these, हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी

A thousand desires such as these
A thousand moments to set this night on fire
Reach out and you can touch them
You can touch them with your silences
You can reach them with your lust
Rivers mountains rain
Rain against a torrid hill’s cape
A thousand
A thousand desires such as these

I loved rain as a child
As a lost young man
Empty landscapes
Bleached by a tired sun
And then
And then suddenly it came
Like a dark unknown woman
Her eyes scorched my silences
Her body wrapped itself around me
Like a summer without end

Pause me hold me reach me
Where no man has gone
Crossing the seven seas
With the wings of fire
I fly towards nowhere
And you
Rivers mountains rain
Rain against a scorched landscape of pain

- From the Hazaaron Khwaishien Aisi Soundtrack

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी....

हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले.

निकलना खुल्द से आदम का सुनते हैं आये हैं लेकिन,
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूंचे से हम निकले.

मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफिर पे दम निकले.

खुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा जालिम,
कहीं ऐसा ना हो, यां भी वही काफिर सनम निकले.

कहाँ मैखाने का दरवाज़ा "ग़ालिब" और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं, कल वो आता था के हम निकले.


     --- मिर्ज़ा  ग़ालिब

Wednesday, October 14, 2009

हम पंछी उन्मुक्त गगन के

हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।

स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी ।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।

---शिवमंगल सिंह सुमन
Try and penetrate with our limited means the secrets of nature and you will find that, behind all the discernible concatenations, there remains something subtle, intangible and inexplicable. Veneration for this force beyond anything that we can comprehend is my religion. To that extent I am, in point of fact, religious.
Albert Einstein
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Poetry and prose by Avishek Ranjan is licensed under a Creative Commons Attribution-ShareAlike 3.0 Unported License